सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

 नौ प्रकार की भक्ति केसे करें?हिन्दू धर्म में भक्ति को सर्वोत्तम स्थान दिया गया है। भक्त की भक्ति के कारण तो भगवान भी दौड़े चले आते हैं। भक्ति की व्याख्या अलग-अलग ग्रंथों में अलग प्रकार से की गयी है। विभिन्न मत और समुदाय भक्ति को अपने तरीके से परिभाषित करते हैं किन्तु हमारे ग्रंथों में नौ प्रकार की भक्ति को बड़ा महत्त्व दिया गया है जिसे "नवधा भक्ति" कहा जाता है।नवधा भक्ति का उल्लेख हमारे ग्रंथों में २ बार किया गया है। इसका पहला वर्णन विष्णु पुराण में आता है जो सतयुग में भगवान के नरसिंह अवतार से सम्बंधित है। इसमें हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद का एक वार्तालाप है जिसमें प्रह्लाद ने अपने पिता को प्रभु की नौ प्रकार की भक्ति के विषय में बताया है। जिसके विधिवत पालन से भगवान का साक्षात्कार किया जा सकता है। प्रह्लाद कहते हैं -Byवनिता कासनियां पंजाबश्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥अर्थात: श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन ये नौ प्रकार की भक्ति कहलाती है।श्रवण: भगवान की कथा और महत्त्व को पूरी श्रद्धा से सुनना।कीर्तन: भगवान के अनंत गुणों का अपने मुख से उच्चारण करते हुए कीर्तन करना।स्मरण: सदैव प्रभु का स्मरण करना।पाद-सेवन: प्रभु के चरणों में स्वयं को अर्पण कर देना।अर्चन: शास्त्रों में वर्णित पवित्र सामग्री से प्रभु का पूजन करना।वंदन: आठ प्रहर ईश्वर की वंदना करना।दास्य: भगवान को स्वामी और स्वयं को उनका दास समझना।सख्य: ईश्वर को ही अपना सर्वोच्च और प्रिय मित्र समझना।आत्मनिवेदन: अपनी स्वतंत्रता त्याग कर स्वयं को पूरी तरह ईश्वर को समर्पित कर देना।इन नौ में भी प्रह्लाद ने श्रवण, कीर्तन और समरण को श्रेष्ठ बताया है और इन तीनों में भी श्रवण को उन्होंने सर्वश्रेष्ठ कहा है।अलग-अलग युगों में नौ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जो इन विभिन्न भक्ति की पराकाष्ठा के रूप में प्रसिद्ध हुए हैं। ये हैं:श्रवण: परीक्षितकीर्तन: शुकदेवस्मरण: प्रह्लादपाद सेवन: माता लक्ष्मीअर्चन: पृथुवंदन: अक्रूरदास्य: हनुमानसख्य: अर्जुनआत्मनिवेदन: दैत्यराज बलिआधुनिक युग में नवधा भक्ति को प्रसिद्ध करने का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास को जाता है। उन्होंने श्री रामचरितमानस के अरण्य कांड में प्रभु श्रीराम द्वारा इस नवधा भक्ति का उल्लेख किया है। रामचरितमानस के अनुसार जब श्रीराम शबरी से मिलते हैं तो वो कहती हैं कि मैं नीच कुल में जन्म लेने वाली आपकी भक्ति की अधिकारिणी कैसे बन सकती हूँ।तब श्रीराम कहते हैं कि "हे भामिनि सुनो! मैं केवल एक ही भक्ति का सम्बन्ध मानता हूँ। जाति-पाति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, कुटुंब, गुण और चतुरता, इन नौ गुणों के होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य ऐसा लगता है जैसे जलहीन बादल। इसके बाद श्रीराम शबरी को नौ प्रकार की भक्ति के विषय में बताते हैं जो तुलसीदास जी ने छः दोहों में समाहित किया है।नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा-प्रसंग में प्रेम।गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति है कि कपट छोड़कर मेरे गुणसमूहों का गान करे।मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥मेरे (राम) मन्त्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास - ये पांचवी भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना।सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥सातवीं भक्ति है जगत भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाये उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराये दोषों को ना देखना।नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपट रहित बर्ताव करना, ह्रदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का ना होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो -सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझमें तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गयी है।बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रमजय श्रीराम। 

 नौ प्रकार की भक्ति केसे करें?


हिन्दू धर्म में भक्ति को सर्वोत्तम स्थान दिया गया है। भक्त की भक्ति के कारण तो भगवान भी दौड़े चले आते हैं। भक्ति की व्याख्या अलग-अलग ग्रंथों में अलग प्रकार से की गयी है। विभिन्न मत और समुदाय भक्ति को अपने तरीके से परिभाषित करते हैं किन्तु हमारे ग्रंथों में नौ प्रकार की भक्ति को बड़ा महत्त्व दिया गया है जिसे "नवधा भक्ति" कहा जाता है।

नवधा भक्ति का उल्लेख हमारे ग्रंथों में २ बार किया गया है। इसका पहला वर्णन विष्णु पुराण में आता है जो सतयुग में भगवान के नरसिंह अवतार से सम्बंधित है। इसमें हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद का एक वार्तालाप है जिसमें प्रह्लाद ने अपने पिता को प्रभु की नौ प्रकार की भक्ति के विषय में बताया है। जिसके विधिवत पालन से भगवान का साक्षात्कार किया जा सकता है। प्रह्लाद कहते हैं -

Byवनिता कासनियां पंजाब

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

अर्थात: श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पाद सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन ये नौ प्रकार की भक्ति कहलाती है।
श्रवण: भगवान की कथा और महत्त्व को पूरी श्रद्धा से सुनना।
कीर्तन: भगवान के अनंत गुणों का अपने मुख से 
उच्चारण करते हुए कीर्तन करना।
स्मरण: सदैव प्रभु का स्मरण करना।
पाद-सेवन: प्रभु के चरणों में स्वयं को अर्पण कर देना।
अर्चन: शास्त्रों में वर्णित पवित्र सामग्री से प्रभु का पूजन करना।
वंदन: आठ प्रहर ईश्वर की वंदना करना।
दास्य: भगवान को स्वामी और स्वयं को उनका दास समझना।
सख्य: ईश्वर को ही अपना सर्वोच्च और प्रिय मित्र समझना।
आत्मनिवेदन: अपनी स्वतंत्रता त्याग कर स्वयं को पूरी तरह ईश्वर को समर्पित कर देना।
इन नौ में भी प्रह्लाद ने श्रवण, कीर्तन और समरण को श्रेष्ठ बताया है और इन तीनों में भी श्रवण को उन्होंने सर्वश्रेष्ठ कहा है।
अलग-अलग युगों में नौ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जो इन विभिन्न भक्ति की पराकाष्ठा के रूप में प्रसिद्ध हुए हैं। ये हैं:
श्रवण: परीक्षित
कीर्तन: शुकदेव
स्मरण: प्रह्लाद
पाद सेवन: माता लक्ष्मी
अर्चन: पृथु
वंदन: अक्रूर
दास्य: हनुमान
सख्य: अर्जुन
आत्मनिवेदन: दैत्यराज बलि
आधुनिक युग में नवधा भक्ति को प्रसिद्ध करने का श्रेय गोस्वामी तुलसीदास को जाता है। उन्होंने श्री रामचरितमानस के अरण्य कांड में प्रभु श्रीराम द्वारा इस नवधा भक्ति का उल्लेख किया है। रामचरितमानस के अनुसार जब श्रीराम शबरी से मिलते हैं तो वो कहती हैं कि मैं नीच कुल में जन्म लेने वाली आपकी भक्ति की अधिकारिणी कैसे बन सकती हूँ।

तब श्रीराम कहते हैं कि "हे भामिनि सुनो! मैं केवल एक ही भक्ति का सम्बन्ध मानता हूँ। जाति-पाति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, कुटुंब, गुण और चतुरता, इन नौ गुणों के होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य ऐसा लगता है जैसे जलहीन बादल। इसके बाद श्रीराम शबरी को नौ प्रकार की भक्ति के विषय में बताते हैं जो तुलसीदास जी ने छः दोहों में समाहित किया है।

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥

मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा-प्रसंग में प्रेम।

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥

तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति है कि कपट छोड़कर मेरे गुणसमूहों का गान करे।

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥

मेरे (राम) मन्त्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास - ये पांचवी भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इन्द्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना।

सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥

सातवीं भक्ति है जगत भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाये उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराये दोषों को ना देखना।

नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥

नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपट रहित बर्ताव करना, ह्रदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का ना होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो -

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥

भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझमें तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गयी है।
बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम

जय श्रीराम। 


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

🚩🪴 कहानिया🪴🚩 "आये हैं समझाने लोग " By वनिता कासनियां पंजाब लोग आएंगे आपको समझाने मगर वो न समझेंगे की दुःख के अलग अलग लेवल्स होतें है। किसी को थोड़ा किसी को ज्यादा और कई लोगों का गम ऐसा होता है की दिखाना बंद हो जाता है , चेतना सुन्न हो जाती है। समझने और सोचने की शक्ति ही ख़तम हो जाती है पर समझना तो पड़ेगा ही इसीलिए ये टाइटल "आये हैं समझने लोग " । दिल को सँभालने के लिए हम तीन लेवल्स पर बात करेंगे । कुछ लोग पहले लेवल से ठीक होना शुरू हो जाएंगे । कुछ को दूसरे की भी ज़रूरत पड़ेगी और कुछ ऐसे इश्क के मारे होंगे जिन्हें तीसरे की भी जरूरत पड़ेगी। । शारीरिक स्तर पर (Physical level ) मानसिक स्तर पर (Psychological level ) आध्यात्मिक स्तर पर (Spiritual level ) 1. शारीरिक स्तर (Physical level ) रोना- धोना टूटे हुए दिल में बसा होता है ढेर सारा गुस्सा, कुंठायें और न ख़तम होने वाला रोना।। शरीर का नियम है की नकारात्मक को अपने आप बाहर फेंकता है। रोना शरीर का एक्सप्रेशन है दिल में बसे नेगेटिव को बाहर फेंकने का। रुलाई अपने आप आती है उसे न रोकें उसे आने दें। लड़कियां रो लेतीं है पर लड़के उस रुलाई को रोक लेते हैं। लड़के गलत करतें हैं। न रोना बहादुरी नहीं है दिल टूटने पर। न रोने पर जिन धागों से आप दोनों के मन जुड़े थे उन में गुंजल पड़ जाती है और वो हमेशा दर्द देते रहतें हैं। लड़कियां और लड़कों, दोनों के लिए, रो लो। जी भर के रो लो। कोई कन्धा हो किसी दोस्त का या फिर अकेले तकिये में मुँह छुपा कर। जैसे भी चाहो पर रो लो। दुःख आंसू बन कर बाहर निकलना शुरू करता है। अपने अहं को अपनी ego को ताक पर रख दें । अगर अहंकार आड़े आ रहा है तो अकेले में रो लें। इस रोने पर कोई अंकुश न बांधें। रोना जब ख़तम हो तो चुपचाप बैठ जायें और साँस को पांच मिनिट देखें की आ रही है और जा रही है । दिल का टूटना भूचाल लाता है और आपको बार बार रोना आएगा। दुःख होगा सबसे प्यारी चीज़ खो जाने का। रो लो यार। तुम बहुत रोये बहुत दुःख हुआ ये उसे न बतायें जिसने दिल तोड़ा है। उसे जरा सा भी असर न होगा। न होगी उसे तुमसे सहानभूति न ही होगी गिल्ट फीलिंग। सब बेकार है इसलिए उसे तो बिलकुल न बताना। अगर ये दोनों बातें होतीं तो वो जाता ही क्यों ? उसे जब बताओगे तो वो और भाव खा जायेगा। "जब वी मेट" दिल बेवफाई से तिलमिला जाता है। गुस्सा ऐसा भरता है की सारे जहाँ में आग लगा दें। अपने प्रेमी को गोली मार दें। याद रहे की आपका उससे दिल का कनेक्शन था और दिल में ही हो रहा है दुःख। इस दुःख का अंत आपके दिल में ही है। इसका सलूशन बाहर नहीं अपने अंदर ही है। तो चलाइये गोली अपने मन में और उसका क़त्ल कर दें उसी दिल में जो कभी उसका था । दीजिये जी भर के गाली। जला दें उसकी तस्वीर और उसकी यादें । बन जायें "जब वी मेट" की करीना कपूर । अपने आप को न रोकें। मन आपका है और खयाल भी आपके हैं। कमरा बंद करें और अच्छी तरह मारें थप्पड़ और घूंसे तकियों को ये समझ कर की उसको मार रहे हैं । मारें जब तक दिल को तसल्ली न हो । फाड़ दें तस्वीरों को, जला दें यादों को। यदि यादों के सहारे बैठे रहे तो इसका मतलब है की उम्मीद के सहारे बैठे हैं और आप को समझना पड़ेगा की उम्मीद को ही ख़तम करना है वार्ना उम्मीद दुःख देती रहेगी। इस तकिये की मार पीट से आपका metabolism बढ़ जायेगा। एक मिनट रुकें और फिर पांच मिनट करैं सहज प्राणायाम। "सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाये" दिल का टूटना असल में एक तनाव (Stress) है, मन का, जो मस्तिष्क को और सारे शरीर पर असर करता है। हिंदुस्तानी चम्पी तेल मालिश एक अचूक इलाज है तनाव को कम करने का। हर रोज मालिश करें सर की और सारे बदन की। इससे खून का प्रवाह तेज़ होता है और शरीर की ऊर्जा का सकारात्मक तरीके से उपयोग होता है। जैसे बिल्ली अपना मुँह फाड़ती है वैसे ही उबासी लें। मुँह फाड़ें और गिनती गिनें दस तक और छोड़ दें। उबासी अपने आप आएगी। सारे दिन बार बार करें। इससे तनाव ग्रस्त मस्तिष्क की नसें ढीली होतीं हैं। एक बार में कम से कम दस उबासी लें। "दिल पर `पत्थर रख कर मैंने मेकअप कर लिया। संया जी से आज मैंने ब्रेकअप कर लिया।" अपने दुःख को अपने पर हावी न होने दें । आगे बढ़ें। ये है बिंदास लोगों के लिए की अपने दोस्तों से मिले , पार्लर जायें और नए हेयर स्टाइल बनायें, नयी दोस्ती बनायें। घर की चार दीवारों में कैद बार बार अपने पर तरस न खाते रहें । व्हिस्की की बोतल से देवदास की तरह दोस्ती न करैं । अगर ये किया तो आप इस गम में और डूबते जायेंगे । चॉइस या चुनना आपके हाथ है । कई बार देवदास बनने में मज़ा भी है। मज़ा लेने के लिए थोड़ी देर देवदास भी बन लें पर ये आपकी मंज़िल नहीं है । ज़रूरी है गम से बाहर निकलना। शराब, पॉट और ड्रग्स गम को और गहरा कर देते हैं। इससे जितना दूर रह सकतें हैं दूर हो जायें । पतझड़ के बाद जैसे बसंत आती है वैसे ही जिंदगी भी अपने रंग बदलती है । थोड़ा प्रक्टिकली (व्यहवारिक ) सोचें । आप की ज़िन्दगी में फिर बहार आएगी । कहीं किसी मोड़ पर कोई आपका इंतज़ार कर रहा है !!! धैर्य रखें थोड़ा। हंसो और मुस्कुराओ वाह भाई क्या सुझाव दिया है ? ठीक सोच रहें हैं। यहां तो रोना आ रहा है हमेशा और आप कह रहें हैं की "हंसो और मुस्कुराओ " "कैसे भाई???" एक पेंसिल लें और उसे होंठों के बीच हॉरिजॉन्टल रखें। (Make a photo) जब आप हँसते हैं तो अपने आप होंठ फैलते हैं। हम अब अपने होटों को जबरदस्ती फहला रहे हैं। ऐसा करने से मस्तिष्क की शिरायें टेंशन को मुक्त करती हैं। दो से पांच मिनट इस एक्सरसाइज़ को करैं। मन शांत होने लगेगा। हंसी,ख़ुशी को व्यक्त करती है और इसके पीछे हैं शरीर के केमिकल्स और मस्तिष्क के स्नायु। आप बिना पेंसिल के भी अपने होंठ फहला सकतें हैं करीब दस सेकण्ड्स के लिए। आपको उबासी भी आएगी। ये सबसे अच्छी चीज़ है इसका मतलब है की आप रिलैक्स हो रहे हैं । दुःख का आधार मन और शरीर मे है। इस प्रक्रिया को कहतें हैं reverse engineering . मन जैसे शरीर को प्रभावित करता है ऐसे ही हम शरीर का उपयोग कर रहें हैं मन को प्रभावित करने को। प्रकृति का सहारा लें। रोज़ सुबह नंगे पाऊं घांस, रेत, मट्टी पर चलें। हम ये कभी भी नहीं करते हैं। ऐसा करने से शरीर की अर्थिंग होती है जो मन और शरीर को ऊर्जा देती है। बगीचे मे टहलें। देखें हरी घास, फूलों के गहरे रंग, भँवरे, तितलिआं और कहैं "WOW" वाह वाह । सूर्यास्त और सूर्योदय देखें और कहैं "शुक्रिया भगवान्" रात मे चाँद सितारे देखें और फिर कहैं "शक्रिया भगवन इस ख़ूबसूरत संसार के लिए " बहती हुई हवा पेड़ों के पत्तों से बात करती है। उसकी सरसराहट सुने, चिड़ियों का कलरव सुने। आप का मन अशांत है पर सारा संसार भगवान् ने परफेक्ट बनाया है। इस संसार को, चाहे मन न भी चाहे पर फिर भी मन से सराहना करें। मन को इस परफेक्ट संसार से जोड़ें। प्रकृति या भगवान् कुछ भी ऐसा नहीं करता है जिससे आप खुश या दुखी होऐं। दुःख और सुख आपके कनेक्शन हैं दूसरों से।

  🚩🪴 कहानिया🪴🚩 "आये हैं समझाने लोग "  By वनिता कासनियां पंजाब लोग आएंगे आपको समझाने मगर वो न समझेंगे की दुःख के अलग अलग लेवल्स होतें है। किसी को थोड़ा किसी को ज्यादा और कई लोगों का गम ऐसा होता है की दिखाना बंद हो जाता है , चेतना सुन्न हो जाती है। समझने और सोचने की शक्ति ही ख़तम हो जाती है पर समझना तो पड़ेगा ही इसीलिए ये टाइटल "आये हैं समझने लोग " । दिल को सँभालने के लिए हम तीन लेवल्स पर बात करेंगे । कुछ लोग पहले लेवल से ठीक होना शुरू हो जाएंगे । कुछ को दूसरे की भी ज़रूरत पड़ेगी और कुछ ऐसे इश्क के मारे होंगे जिन्हें तीसरे की भी जरूरत पड़ेगी। । शारीरिक स्तर पर (Physical level ) मानसिक स्तर पर (Psychological level ) आध्यात्मिक स्तर पर (Spiritual level ) 1. शारीरिक स्तर (Physical level ) रोना- धोना टूटे हुए दिल में बसा होता है ढेर सारा गुस्सा, कुंठायें और न ख़तम होने वाला रोना।। शरीर का नियम है की नकारात्मक को अपने आप बाहर फेंकता है। रोना शरीर का एक्सप्रेशन है दिल में बसे नेगेटिव को बाहर फेंकने का। रुलाई अपने आप आती है उसे न रोकें उसे आने दें। लड़कियां रो लेतीं है प...

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्री गणेश के अवतार By वनिता कासनियां पंजाब श्रीगणेश के अवतारहम सबने भगवान विष्णु के दशावतार और भगवान शंकर के १९ अवतारों के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे "अष्टरूप" कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं।वक्रतुंड: मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड वाले "वक्रतुंड" अवतार लिया और मत्सरासुर को ललकारा। अपने पिता की रक्षा के लिए सुंदरप्रिय और विषप्रिय दोनों ने उनपर आक्रमण किया किन्तु श्रीगणेश ने उन्हें तत्काल अपनी सूंड में लपेट कर मार डाला। ये देख कर मत्सरासुर ने अपनी पराजय स्वीकार की और श्रीगणेश का भक्त बन गया।एकदंत: एक बार महर्षि च्यवन को एक पुत्र की इच्छा हुई तो उन्होंने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और हर प्रकार की विद्या और युद्धकला में निपुण बन गया। अपनी सिद्धियों के बल पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया और सभी देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। सभी देवों ने एक स्वर में श्रीगणेश को पुकारा। इनकी रक्षा के लिए तब वे "एकदंत" के रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं और एक दांत था। वे चतुर्भुज रूप में थे जिनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय का वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।महोदर: जब कार्तिकेय जी ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के विरुद्ध खड़ा किया। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता था और उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

जब एक बच्चा पैदा होता है और गर्भनाल काट दी जाती है, तो उस टुकड़े का क्या होता है जो अभी भी माँ से जुड़ा होता है?

जब एक बच्चा पैदा होता है और गर्भनाल काट दी जाती है, तो उस टुकड़े का क्या होता है जो अभी भी माँ से जुड़ा होता है? By  वनिता कासनियां पंजाब बच्चा पैदा होने पर वह भाग गर्भनाल काट दी जाती है तो क्या होता है ? यह भाग जो मां से जुड़ा होता है उसे प्लेसेंटा कहते हैं । यह बच्चे को भोजन देने का काम करता है। हर माह एक निश्चित समय पर इसी के कारण पेट मे दर्द होता है। यह एक निश्चित स्थान होता है जो हर माह एक निश्चित समय पर फ़ूल ता है और चट कता है। जिससे रक्त आता है।और पेट मे दर्द होता है । इसे मेन्सट्रूअल सायकिल , एम सी , पीरियड या माहवारी कहते हँ। यह प्रकृति की ओर से एक दिया गया वरदान है जो स्वयं अपने भोजन का इंतजाम कर देता है। मां जो भी चीज खाती है इसके द्वारा बच्चे को मिलती है। यह इसके द्वारा माँ से सांस भी लेता है। बच्चा पैदा होने के बाद मां को सुरक्षित रखने के लिए इसी यह निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं । एक लोहे के चमचे को पानी में छौंक कर पानी दिया जाता है।इससे आयरन मिलता है। इसके लिये ही तो चरुआ रखते हैं व अजवायन का गर्म पानी पिलाते हैं । या पीपरामूल को भी खौलाकर पानी बनाते हैं। अजवायन की धू...