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उड़द दाल: स्वाद और सेहत का खजाना By वनिता कासनियां पंजाब आयुर्वेद में उड़द को धान्यवीर, बीजरत्न, वृषांकुर, बलाढ्य, मासल आदि नामों से जाना जाता है, वहीं अरबी व फ़ारसी में इसे माषा/माष कहा जाता है। अब नामों में ही उड़द की महिमा छिपी है अर्थात आयुर्वेद में इसे मासवर्धक, बलवर्धक, वीर्यवर्धक, दुग्धवर्धक, वाजीकारक, तृप्तिजनक, पौष्टिक, स्वादिष्ट व स्निग्ध तथा परिणाम शूल, अर्दित और बवासीर में लाभकारी कहा गया है। हृदय के लिए उत्तम और थकान को दूर करने वाली है।लेकिन फिर उड़द का उपभोग दालों में अरहर/तूर, चना, मसूर और मूंग के बाद पांचवें नम्बर पर क्यों है? असल में उड़द वात, मेद (वसा), कफ को बढ़ाने वाली, रक्तरोग कारक और पचने में भारी होती है। भावप्रकाश संहिता के अनुसार उड़द, दही, मछली और बैंगन, ये चारों कफ और पित्त को बढ़ाने वाले हैं।शास्त्रों में उड़द को सभी दालों में निकृष्ट कहा गया है लेकिन उन्हीं शास्त्रों में जई (ओट/Oats) को भी अधम कहा गया है जिसके (जई/Oat) तो इस समय बड़े गुणगान हो रहे हैं।असल में आधा अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है। लोग आधे ज्ञान के आधार पर निष्कर्ष निकालने लगते हैं जो कभी सही नहीं हो सकता। आष्टाङ्गहृदय के अनुसार एक साल पुराने अन्न अपनी गुरुता त्याग देते हैं और मृदु/हल्के हो जाते हैं।साधारण नियम है कि जो खाद्यान्न पकने में देर लगाते हैं, वे पचने में देर लगाते हैं अर्थात भारी/गुरु होते हैं।ऐसे में घी अथवा तेल में भून लेने से वे अपनी गुरूता को त्याग कर जल्दी पक जाते हैं। छिलका उतार देने से भी गुरूता कम हो जाती है। बिना घी-तेल के भुने (रोस्टेड) हुए अन्न लघु हो जाते हैं।भावप्रकाश पूर्वखण्ड में लिखा है कि उड़द की दाल को हींग के साथ पकाने से उसमे स्वाद बढ़ जाता है और वह लघु भी हो जाती है। भारतीय द्रव्यगुण विज्ञान के अनुसार उड़द के दोषों को नष्ट करने के लिए इसमें हींग मिलाना आवश्यक है। यूनानी चिकित्सा के मतानुसार माष/उड़द के दर्प का नाश करने के लिए कालीमिर्च, अदरक और हींग का उपयोग करना चाहिए।आखिर में इतना कि उड़द की दाल का आनन्द लेने के लिए आपका पाचन दुरुस्त होना चाहिए।यह मेरी पसंदीदा रेसिपी है। हालांकि मैं छिलका वाली उड़द कम पसंद करता हूं लेकिन मैंने इसमें आधी छिलका सहित और आधी बिना छिलका डाल का प्रयोग किया है। कहने की जरूरत नहीं कि यह पहले घी में भुनी हुई है और पर्याप्त मात्रा में हींग, अदरक और कालीमिर्च के साथ लहसुन व पंचफोड़न (जीरा, मेथी, अजवाइन, कलौंजी/मंगरैल और सौंफ) का भी प्रयोग किया है। मगर हल्दी का उपयोग दाल के बजाए चावलों में किया है जिसके साथ चावलों में कुछ भीगने के बाद उबाले और फिर हल्का तले हुए चने भी डाले हैं जिससे कारण चावलों में भी हींग और जीरा का प्रयोग किया है। चावलों में आधी मात्रा सामान्य बासमती और आधी मात्रा पुराने शालिचावल का प्रयोग किया है।इति,बेहतर जीवन और उत्तम स्वास्थ्य की अशेष शुभकामनाओं के साथ, सवाल पूछने के लिए बहुत बहुत आभार और उत्तर को पूरा पढ़ने के लिए कोटिशः धन्यवाद! 🙏💐मैं आयुर्वेद की खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस लाने के अपने अभियान में यहां पर उपस्थित हूं। आप भी मेरे साथ इस मुहिम में, अभियान में, खोज में, शामिल हो सकते हैं बस थोड़ी से जतन से - पोस्ट को अपवोट और शेयर करके और साथ ही एक कॉमेंट करके। इससे यह ज्ञान ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सकेगा और लोगों की मदद हो सकेगी। आप चाहें तो अपनी अलग कोई इस तरह की पहल कर सकते हैं। लेकिन कुछ तो करिए! 🙏💐स्वास्थ्य घरेलू नुस्खेजाने से पहले मैं इस लेख को अंत तक पढ़ने के लिए स्वस्थ और निरोगी जीवन की शुभकामनाओं के साथ, बहुत-बहुत धन्यवाद कहती हु ! 🙏मैं एक छोटा सा फेवर माँगना चाहती हूँ कि आपको मेरा लेख पसंद आया है तो इसे अपने दोस्तों के साथ और संबंधित मंचों पर साझा करें ताकि औरों को भी लाभ हो सके; दूसरों की मदद करें! हमारी साझी विरासत आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार के सहभागी बनें।पाक विधिआपकी हर प्रतिक्रिया मुझे उस तरह के लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित करेगी जो आपको अच्छे तर्कों के साथ यथेष्ठ जानकारी वाले बेहतर परिणाम प्राप्त करने में मदद करते हैं।अगर आपने इस लेख को पसंद किया है, तो कृपया मुझे कॉमेंट में बताएं...अगर नहीं भी पसंद किया है तो भी कॉमेंट में बताएं। अगर आपके पास कोई प्रश्न है? मुझे अपने विचार नीचे टिप्पणियों में सुनने दें! यकीन मानिए कॉमेंट करने से बहुत फर्क पड़ता है।शुभकामनाएं। 🙏💐

आयुर्वेद में उड़द को धान्यवीर, बीजरत्न, वृषांकुर, बलाढ्य, मासल आदि नामों से जाना जाता है, वहीं अरबी व फ़ारसी में इसे माषा/माष कहा जाता है। अब नामों में ही उड़द की महिमा छिपी है अर्थात आयुर्वेद में इसे मासवर्धक, बलवर्धक, वीर्यवर्धक, दुग्धवर्धक, वाजीकारक, तृप्तिजनक, पौष्टिक, स्वादिष्ट व स्निग्ध तथा परिणाम शूल, अर्दित और बवासीर में लाभकारी कहा गया है। हृदय के लिए उत्तम और थकान को दूर करने वाली है।

लेकिन फिर उड़द का उपभोग दालों में अरहर/तूर, चना, मसूर और मूंग के बाद पांचवें नम्बर पर क्यों है? असल में उड़द वात, मेद (वसा), कफ को बढ़ाने वाली, रक्तरोग कारक और पचने में भारी होती है। भावप्रकाश संहिता के अनुसार उड़द, दही, मछली और बैंगन, ये चारों कफ और पित्त को बढ़ाने वाले हैं।

शास्त्रों में उड़द को सभी दालों में निकृष्ट कहा गया है लेकिन उन्हीं शास्त्रों में जई (ओट/Oats) को भी अधम कहा गया है जिसके (जई/Oat) तो इस समय बड़े गुणगान हो रहे हैं।

असल में आधा अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है। लोग आधे ज्ञान के आधार पर निष्कर्ष निकालने लगते हैं जो कभी सही नहीं हो सकता। आष्टाङ्गहृदय के अनुसार एक साल पुराने अन्न अपनी गुरुता त्याग देते हैं और मृदु/हल्के हो जाते हैं।

साधारण नियम है कि जो खाद्यान्न पकने में देर लगाते हैं, वे पचने में देर लगाते हैं अर्थात भारी/गुरु होते हैं

ऐसे में घी अथवा तेल में भून लेने से वे अपनी गुरूता को त्याग कर जल्दी पक जाते हैं। छिलका उतार देने से भी गुरूता कम हो जाती है। बिना घी-तेल के भुने (रोस्टेड) हुए अन्न लघु हो जाते हैं।

भावप्रकाश पूर्वखण्ड में लिखा है कि उड़द की दाल को हींग के साथ पकाने से उसमे स्वाद बढ़ जाता है और वह लघु भी हो जाती है। भारतीय द्रव्यगुण विज्ञान के अनुसार उड़द के दोषों को नष्ट करने के लिए इसमें हींग मिलाना आवश्यक है। यूनानी चिकित्सा के मतानुसार माष/उड़द के दर्प का नाश करने के लिए कालीमिर्च, अदरक और हींग का उपयोग करना चाहिए।

आखिर में इतना कि उड़द की दाल का आनन्द लेने के लिए आपका पाचन दुरुस्त होना चाहिए।

यह मेरी पसंदीदा रेसिपी है। हालांकि मैं छिलका वाली उड़द कम पसंद करता हूं लेकिन मैंने इसमें आधी छिलका सहित और आधी बिना छिलका डाल का प्रयोग किया है। कहने की जरूरत नहीं कि यह पहले घी में भुनी हुई है और पर्याप्त मात्रा में हींग, अदरक और कालीमिर्च के साथ लहसुन व पंचफोड़न (जीरा, मेथी, अजवाइन, कलौंजी/मंगरैल और सौंफ) का भी प्रयोग किया है। मगर हल्दी का उपयोग दाल के बजाए चावलों में किया है जिसके साथ चावलों में कुछ भीगने के बाद उबाले और फिर हल्का तले हुए चने भी डाले हैं जिससे कारण चावलों में भी हींग और जीरा का प्रयोग किया है। चावलों में आधी मात्रा सामान्य बासमती और आधी मात्रा पुराने शालिचावल का प्रयोग किया है।

इति,


बेहतर जीवन और उत्तम स्वास्थ्य की अशेष शुभकामनाओं के साथ, सवाल पूछने के लिए बहुत बहुत आभार और उत्तर को पूरा पढ़ने के लिए कोटिशः धन्यवाद! 🙏💐

मैं आयुर्वेद की खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस लाने के अपने अभियान में यहां पर उपस्थित हूं। आप भी मेरे साथ इस मुहिम में, अभियान में, खोज में, शामिल हो सकते हैं बस थोड़ी से जतन से - पोस्ट को अपवोट और शेयर करके और साथ ही एक कॉमेंट करके। इससे यह ज्ञान ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सकेगा और लोगों की मदद हो सकेगी। आप चाहें तो अपनी अलग कोई इस तरह की पहल कर सकते हैं। लेकिन कुछ तो करिए! 🙏💐

स्वास्थ्य घरेलू नुस्खे

जाने से पहले मैं इस लेख को अंत तक पढ़ने के लिए स्वस्थ और निरोगी जीवन की शुभकामनाओं के साथ, बहुत-बहुत धन्यवाद कहती हु ! 🙏

मैं एक छोटा सा फेवर माँगना चाहती हूँ कि आपको मेरा लेख पसंद आया है तो इसे अपने दोस्तों के साथ और संबंधित मंचों पर साझा करें ताकि औरों को भी लाभ हो सके; दूसरों की मदद करें! हमारी साझी विरासत आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार के सहभागी बनें।

पाक विधि

आपकी हर प्रतिक्रिया मुझे उस तरह के लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित करेगी जो आपको अच्छे तर्कों के साथ यथेष्ठ जानकारी वाले बेहतर परिणाम प्राप्त करने में मदद करते हैं।

अगर आपने इस लेख को पसंद किया है, तो कृपया मुझे कॉमेंट में बताएं...अगर नहीं भी पसंद किया है तो भी कॉमेंट में बताएं। अगर आपके पास कोई प्रश्न है? मुझे अपने विचार नीचे टिप्पणियों में सुनने दें! यकीन मानिए कॉमेंट करने से बहुत फर्क पड़ता है।

शुभकामनाएं। 🙏💐

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🚩🪴 कहानिया🪴🚩 "आये हैं समझाने लोग " By वनिता कासनियां पंजाब लोग आएंगे आपको समझाने मगर वो न समझेंगे की दुःख के अलग अलग लेवल्स होतें है। किसी को थोड़ा किसी को ज्यादा और कई लोगों का गम ऐसा होता है की दिखाना बंद हो जाता है , चेतना सुन्न हो जाती है। समझने और सोचने की शक्ति ही ख़तम हो जाती है पर समझना तो पड़ेगा ही इसीलिए ये टाइटल "आये हैं समझने लोग " । दिल को सँभालने के लिए हम तीन लेवल्स पर बात करेंगे । कुछ लोग पहले लेवल से ठीक होना शुरू हो जाएंगे । कुछ को दूसरे की भी ज़रूरत पड़ेगी और कुछ ऐसे इश्क के मारे होंगे जिन्हें तीसरे की भी जरूरत पड़ेगी। । शारीरिक स्तर पर (Physical level ) मानसिक स्तर पर (Psychological level ) आध्यात्मिक स्तर पर (Spiritual level ) 1. शारीरिक स्तर (Physical level ) रोना- धोना टूटे हुए दिल में बसा होता है ढेर सारा गुस्सा, कुंठायें और न ख़तम होने वाला रोना।। शरीर का नियम है की नकारात्मक को अपने आप बाहर फेंकता है। रोना शरीर का एक्सप्रेशन है दिल में बसे नेगेटिव को बाहर फेंकने का। रुलाई अपने आप आती है उसे न रोकें उसे आने दें। लड़कियां रो लेतीं है पर लड़के उस रुलाई को रोक लेते हैं। लड़के गलत करतें हैं। न रोना बहादुरी नहीं है दिल टूटने पर। न रोने पर जिन धागों से आप दोनों के मन जुड़े थे उन में गुंजल पड़ जाती है और वो हमेशा दर्द देते रहतें हैं। लड़कियां और लड़कों, दोनों के लिए, रो लो। जी भर के रो लो। कोई कन्धा हो किसी दोस्त का या फिर अकेले तकिये में मुँह छुपा कर। जैसे भी चाहो पर रो लो। दुःख आंसू बन कर बाहर निकलना शुरू करता है। अपने अहं को अपनी ego को ताक पर रख दें । अगर अहंकार आड़े आ रहा है तो अकेले में रो लें। इस रोने पर कोई अंकुश न बांधें। रोना जब ख़तम हो तो चुपचाप बैठ जायें और साँस को पांच मिनिट देखें की आ रही है और जा रही है । दिल का टूटना भूचाल लाता है और आपको बार बार रोना आएगा। दुःख होगा सबसे प्यारी चीज़ खो जाने का। रो लो यार। तुम बहुत रोये बहुत दुःख हुआ ये उसे न बतायें जिसने दिल तोड़ा है। उसे जरा सा भी असर न होगा। न होगी उसे तुमसे सहानभूति न ही होगी गिल्ट फीलिंग। सब बेकार है इसलिए उसे तो बिलकुल न बताना। अगर ये दोनों बातें होतीं तो वो जाता ही क्यों ? उसे जब बताओगे तो वो और भाव खा जायेगा। "जब वी मेट" दिल बेवफाई से तिलमिला जाता है। गुस्सा ऐसा भरता है की सारे जहाँ में आग लगा दें। अपने प्रेमी को गोली मार दें। याद रहे की आपका उससे दिल का कनेक्शन था और दिल में ही हो रहा है दुःख। इस दुःख का अंत आपके दिल में ही है। इसका सलूशन बाहर नहीं अपने अंदर ही है। तो चलाइये गोली अपने मन में और उसका क़त्ल कर दें उसी दिल में जो कभी उसका था । दीजिये जी भर के गाली। जला दें उसकी तस्वीर और उसकी यादें । बन जायें "जब वी मेट" की करीना कपूर । अपने आप को न रोकें। मन आपका है और खयाल भी आपके हैं। कमरा बंद करें और अच्छी तरह मारें थप्पड़ और घूंसे तकियों को ये समझ कर की उसको मार रहे हैं । मारें जब तक दिल को तसल्ली न हो । फाड़ दें तस्वीरों को, जला दें यादों को। यदि यादों के सहारे बैठे रहे तो इसका मतलब है की उम्मीद के सहारे बैठे हैं और आप को समझना पड़ेगा की उम्मीद को ही ख़तम करना है वार्ना उम्मीद दुःख देती रहेगी। इस तकिये की मार पीट से आपका metabolism बढ़ जायेगा। एक मिनट रुकें और फिर पांच मिनट करैं सहज प्राणायाम। "सर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाये" दिल का टूटना असल में एक तनाव (Stress) है, मन का, जो मस्तिष्क को और सारे शरीर पर असर करता है। हिंदुस्तानी चम्पी तेल मालिश एक अचूक इलाज है तनाव को कम करने का। हर रोज मालिश करें सर की और सारे बदन की। इससे खून का प्रवाह तेज़ होता है और शरीर की ऊर्जा का सकारात्मक तरीके से उपयोग होता है। जैसे बिल्ली अपना मुँह फाड़ती है वैसे ही उबासी लें। मुँह फाड़ें और गिनती गिनें दस तक और छोड़ दें। उबासी अपने आप आएगी। सारे दिन बार बार करें। इससे तनाव ग्रस्त मस्तिष्क की नसें ढीली होतीं हैं। एक बार में कम से कम दस उबासी लें। "दिल पर `पत्थर रख कर मैंने मेकअप कर लिया। संया जी से आज मैंने ब्रेकअप कर लिया।" अपने दुःख को अपने पर हावी न होने दें । आगे बढ़ें। ये है बिंदास लोगों के लिए की अपने दोस्तों से मिले , पार्लर जायें और नए हेयर स्टाइल बनायें, नयी दोस्ती बनायें। घर की चार दीवारों में कैद बार बार अपने पर तरस न खाते रहें । व्हिस्की की बोतल से देवदास की तरह दोस्ती न करैं । अगर ये किया तो आप इस गम में और डूबते जायेंगे । चॉइस या चुनना आपके हाथ है । कई बार देवदास बनने में मज़ा भी है। मज़ा लेने के लिए थोड़ी देर देवदास भी बन लें पर ये आपकी मंज़िल नहीं है । ज़रूरी है गम से बाहर निकलना। शराब, पॉट और ड्रग्स गम को और गहरा कर देते हैं। इससे जितना दूर रह सकतें हैं दूर हो जायें । पतझड़ के बाद जैसे बसंत आती है वैसे ही जिंदगी भी अपने रंग बदलती है । थोड़ा प्रक्टिकली (व्यहवारिक ) सोचें । आप की ज़िन्दगी में फिर बहार आएगी । कहीं किसी मोड़ पर कोई आपका इंतज़ार कर रहा है !!! धैर्य रखें थोड़ा। हंसो और मुस्कुराओ वाह भाई क्या सुझाव दिया है ? ठीक सोच रहें हैं। यहां तो रोना आ रहा है हमेशा और आप कह रहें हैं की "हंसो और मुस्कुराओ " "कैसे भाई???" एक पेंसिल लें और उसे होंठों के बीच हॉरिजॉन्टल रखें। (Make a photo) जब आप हँसते हैं तो अपने आप होंठ फैलते हैं। हम अब अपने होटों को जबरदस्ती फहला रहे हैं। ऐसा करने से मस्तिष्क की शिरायें टेंशन को मुक्त करती हैं। दो से पांच मिनट इस एक्सरसाइज़ को करैं। मन शांत होने लगेगा। हंसी,ख़ुशी को व्यक्त करती है और इसके पीछे हैं शरीर के केमिकल्स और मस्तिष्क के स्नायु। आप बिना पेंसिल के भी अपने होंठ फहला सकतें हैं करीब दस सेकण्ड्स के लिए। आपको उबासी भी आएगी। ये सबसे अच्छी चीज़ है इसका मतलब है की आप रिलैक्स हो रहे हैं । दुःख का आधार मन और शरीर मे है। इस प्रक्रिया को कहतें हैं reverse engineering . मन जैसे शरीर को प्रभावित करता है ऐसे ही हम शरीर का उपयोग कर रहें हैं मन को प्रभावित करने को। प्रकृति का सहारा लें। रोज़ सुबह नंगे पाऊं घांस, रेत, मट्टी पर चलें। हम ये कभी भी नहीं करते हैं। ऐसा करने से शरीर की अर्थिंग होती है जो मन और शरीर को ऊर्जा देती है। बगीचे मे टहलें। देखें हरी घास, फूलों के गहरे रंग, भँवरे, तितलिआं और कहैं "WOW" वाह वाह । सूर्यास्त और सूर्योदय देखें और कहैं "शुक्रिया भगवान्" रात मे चाँद सितारे देखें और फिर कहैं "शक्रिया भगवन इस ख़ूबसूरत संसार के लिए " बहती हुई हवा पेड़ों के पत्तों से बात करती है। उसकी सरसराहट सुने, चिड़ियों का कलरव सुने। आप का मन अशांत है पर सारा संसार भगवान् ने परफेक्ट बनाया है। इस संसार को, चाहे मन न भी चाहे पर फिर भी मन से सराहना करें। मन को इस परफेक्ट संसार से जोड़ें। प्रकृति या भगवान् कुछ भी ऐसा नहीं करता है जिससे आप खुश या दुखी होऐं। दुःख और सुख आपके कनेक्शन हैं दूसरों से।

  🚩🪴 कहानिया🪴🚩 "आये हैं समझाने लोग "  By वनिता कासनियां पंजाब लोग आएंगे आपको समझाने मगर वो न समझेंगे की दुःख के अलग अलग लेवल्स होतें है। किसी को थोड़ा किसी को ज्यादा और कई लोगों का गम ऐसा होता है की दिखाना बंद हो जाता है , चेतना सुन्न हो जाती है। समझने और सोचने की शक्ति ही ख़तम हो जाती है पर समझना तो पड़ेगा ही इसीलिए ये टाइटल "आये हैं समझने लोग " । दिल को सँभालने के लिए हम तीन लेवल्स पर बात करेंगे । कुछ लोग पहले लेवल से ठीक होना शुरू हो जाएंगे । कुछ को दूसरे की भी ज़रूरत पड़ेगी और कुछ ऐसे इश्क के मारे होंगे जिन्हें तीसरे की भी जरूरत पड़ेगी। । शारीरिक स्तर पर (Physical level ) मानसिक स्तर पर (Psychological level ) आध्यात्मिक स्तर पर (Spiritual level ) 1. शारीरिक स्तर (Physical level ) रोना- धोना टूटे हुए दिल में बसा होता है ढेर सारा गुस्सा, कुंठायें और न ख़तम होने वाला रोना।। शरीर का नियम है की नकारात्मक को अपने आप बाहर फेंकता है। रोना शरीर का एक्सप्रेशन है दिल में बसे नेगेटिव को बाहर फेंकने का। रुलाई अपने आप आती है उसे न रोकें उसे आने दें। लड़कियां रो लेतीं है प...

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मत्सरासुर को ललकारा। अपने पिता की रक्षा के लिए सुंदरप्रिय और विषप्रिय दोनों ने उनपर आक्रमण किया किन्तु श्रीगणेश ने उन्हें तत्काल अपनी सूंड में लपेट कर मार डाला। ये देख कर मत्सरासुर ने अपनी पराजय स्वीकार की और श्रीगणेश का भक्त बन गया।एकदंत: एक बार महर्षि च्यवन को एक पुत्र की इच्छा हुई तो उन्होंने अपने तपोबल से मद नाम के राक्षस की रचना की। वह च्यवन का पुत्र कहलाया। मद ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और हर प्रकार की विद्या और युद्धकला में निपुण बन गया। अपनी सिद्धियों के बल पर उसने देवताओं का विरोध शुरू कर दिया और सभी देवता उससे प्रताडि़त रहने लगे। सभी देवों ने एक स्वर में श्रीगणेश को पुकारा। इनकी रक्षा के लिए तब वे "एकदंत" के रूप में प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं और एक दांत था। वे चतुर्भुज रूप में थे जिनके हाथ में पाश, परशु, अंकुश और कमल था। एकदंत ने देवताओं को अभय का वरदान दिया और मदासुर को युद्ध में पराजित किया।महोदर: जब कार्तिकेय जी ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं के विरुद्ध खड़ा किया। वे अनेक अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञाता था और उसका शरीर बहुत विशाल था। उसकी शक्ति की भी कोई सीमा नहीं थी। जब उस विकट रूप में मोहासुर देवताओं के सामने पहुंचा तो वे भयभीत हो गए। तब देवताओं की रक्षा के लिए श्रीगणेश ने "महोदर" अवतार लिया। उस रूप में उनका उदर अर्थात पेट इतना बड़ा था कि उसने आकाश को आच्छादित कर दिया। जब वे मोहासुर के समक्ष पहुंचे तो उनका वो अद्भुत रूप देख कर मोहासुर ने बिना युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसने देव महोदर को ही अपना इष्ट बना लिया।विकट: जालंधर और वृंदा की कथा तो हम सभी जानते हैं। जब श्रीहरि ने जालंधर के विनाश हेतु उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया तो महादेव ने जालंधर का वध कर दिया। तत्पश्चात वृंदा ने आत्मदाह कर लिया और उन्ही के क्रोध से कामासुर का एक महापराक्रमी दैत्य उत्पन्न हुआ। उसने महादेव से कई अवतार प्राप्त कर त्रिलोक पर अधिकार जमा लिया। त्रिलोक को त्रस्त जान कर श्रीगणेश ने "विकट" रूप में अवतार लिया और अपने उस अवतार में उन्होंने अपने बड़े भाई कार्तिकेय के मयूर को अपना वाहन बनाया। उसके बाद उन्होंने कामासुर को घोर युद्ध कर उसे पराजित किया और देवताओं को निष्कंटक किया। बाद में कामासुर श्रीगणेश का भक्त बन गया। गजानन: एक बार धनपति कुबेर को अपने धन पर अहंकार और लोभ हो गया। उनके लोभ से लोभासुर नाम के असुर का जन्म हुआ। मार्गदर्शन के लिए वो शुक्राचार्य की शरण में गया। शुक्राचार्य ने उसे महादेव की तपस्या करने का आदेश दिया। उसने भोलेनाथ की घोर तपस्या की जिसके बाद महादेव ने उसे त्रिलोक विजय का वरदान दे दिया। उस वरदान के मद में लोभासुर स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल का अधिपति हो गया। सारे देवता स्वर्ग से हाथ धोकर अपने गुरु बृहस्पति के पास गए। देवगुरु ने उन्हें श्रीगणेश की तपस्या करने को कहा। देवराज इंद्र के साथ सभी देवों ने श्रीगणेश की तपस्या की जिससे श्रीगणेश प्रसन्न हुए और उन्होंने देवताओं को आश्वासन दिया कि वे अवश्य उनका उद्धार करेंगे। गणेशजी "गजानन" रूप में पृथ्वी पर आये और अपने मूषक द्वारा लोभासुर को युद्ध का सन्देश भेजा। जब शुक्राचार्य ने जाना कि गजानन स्वयं आये हैं तो लोभासुर की पराजय निश्चित जान कर उन्होंने उसे श्रीगणेश की शरण में जाने का उपदेश दिया। अपनी गुरु की बात सुनकर लोभासुर ने बिना युद्ध किए ही अपनी पराजय स्वीकार कर ली और उनका भक्त बन गया।लंबोदर: क्रोधासुर नाम नाम का एक दैत्य था जो अजेय बनना चाहता था। उसने इसी इच्छा से भगवान सूर्यनारायण की तपस्या की और उनसे ब्रह्माण्ड विजय का वरदान प्राप्त कर लिया। वरदान प्राप्त करने के बाद क्रोधासुर विश्वविजय के अभियान पर निकला। उसे स्वर्ग की ओर आते देख इंद्र और सभी देवता भयभीत हो गए। उन्होंने श्रीगणेश से प्रार्थना की कि वो किसी भी प्रकार क्रोधासुर को स्वर्ग पहुँचने से रोकें। तब वे "लम्बोदर" का रूप लेकर क्रोधासुर के पास आये और उसे समझाया कि वो कभी भी अजेय नहीं बन सकता। इस पर क्रोधासुर उनकी बात ना मान कर स्वर्ग की ओर बढ़ने लगा। ये देख कर श्रीगणेश ने अपने उदर (पेट) द्वारा उस मार्ग को बंद कर दिया। ये देख कर क्रोधासुर दूसरे मार्ग की ओर मुड़ा। तब लम्बोदर रुपी श्रीगणेश ने अपने उदर को विस्तृत कर वो मार्ग भी रुद्ध कर दिया। क्रोधासुर जिस भी मार्ग पर जाता, श्रीगणेश अपने उदर से उस मार्ग को बंद कर देते। ये देख कर क्रोधासुर का अभिमान समाप्त हुआ और वो श्रीगणेश का भक्त बन गया। उनके आदेश पर उसने अपना युद्ध अभियान बंद कर दिया और पाताल में जाकर बस गया।विघ्नराज: एक बार माता पार्वती कैलाश पर अपनी सखियों के साथ बातचीत कर रही थी। उसी दौरान वे जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। चूँकि उसका जन्म माता पार्वती के ममता भाव से हुआ था इसीलिए उन्होंने उसका नाम मम रखा। बाद में मम देवी पार्वती की आज्ञा से वन में तपस्या करने चला गया। वही वो असुरराज शंबरासुर से मिला। उसे योग्य जान कर शम्बरासुर ने उसे कई प्रकार की आसुरी शक्तियां सिखा दीं। बाद में शम्बरासुर ने मम को श्री गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर अपार शक्ति का स्वामी बन गया। तप पूर्ण होने के बाद शम्बरासुर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। जब दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उन्होंने उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। अपने बल के मद में आकर ममासुर ने देवताओं पर आक्रमण किया और उन्हें परास्त कर कारागार में डाल दिया। तब उसी कारावास में देवताओं ने गणेश की उपासना की जिससे प्रसन्न हो श्रीगणेश "विघ्नराज" (विघ्नेश्वर) के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर को युद्ध के लिए ललकारा और उसे परास्त कर उसका मान मर्दन किया। अंततः ममासुर उनकी शरण में आ गया। तत्पश्चात उन्होंने देवताओं को मुक्त कर उनके विघ्न का नाश किया। धूम्रवर्ण: एक बार भगवान सूर्यनारायण को छींक आ गई और उनकी छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उस दैत्य का नाम उन्होंने अहम रखा। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से शिक्षा ली और अहंतासुर नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में उसने अपना स्वयं का राज्य बसाया और तप कर श्रीगणेश को प्रसन्न किया। उनसे उसे अनेकानेक वरदान प्राप्त हुए। वरदान प्राप्त कर वो निरंकुश हो गया और बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब उसे रोकने के लिए श्री गणेश ने धुंए के रंग वाले रूप में अवतार लिया और उसी कारण उनका नाम "धूम्रवर्ण" पड़ा। उनके हाथ में एक दुर्जय पाश था जिससे सदैव ज्वालाएं निकलती रहती थीं। धूम्रवर्ण के रुप में गणेश जी ने अहंतासुर को उस पाश से जकड लिया। अहम् ने उस पाश से छूटने का बड़ा प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हुआ। अंत में उसने अपनी पराजय स्वीकार कर ली और देव धूम्रवर्ण की शरण में आ गया। तब उन्होंने अहंतासुर को अपनी अनंत भक्ति प्रदान की।

राष्ट्र हिंदू धर्म में श्रीगणेश के अवतार By  वनिता कासनियां पंजाब हम सबने भगवान विष्णु के  दशावतार  और  भगवान शंकर के १९ अवतारों  के विषय में सुना है। किन्तु क्या आपको श्रीगणेश के अवतारों के विषय में पता है? वैसे तो श्रीगणेश के कई रूप और अवतार हैं किन्तु उनमें से आठ अवतार जिसे  "अष्टरूप"  कहते हैं, वो अधिक प्रसिद्ध हैं। इन आठ अवतारों की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इन्ही सभी अवतारों में श्रीगणेश ने अपने शत्रुओं का वध नहीं किया बल्कि उनके प्रताप से वे सभी स्वतः उनके भक्त हो गए। आइये उसके विषय में कुछ जानते हैं। वक्रतुंड:  मत्स्यरासुर नामक एक राक्षस था जो महादेव का बड़ा भक्त था। उसने भगवान शंकर की तपस्या कर ये वरदान प्राप्त किया कि उसे किसी का भय ना हो। वरदान पाने के बाद मत्सरासुर ने देवताओं को प्रताडि़त करना शुरू कर दिया। उसके दो पुत्र थे - सुंदरप्रिय और विषयप्रिय जो अपने पिता के समान ही अत्याचारी थे। उनके अत्याचार से तंग आकर सभी देवता महादेव की शरण में पहुंचे। शिवजी ने उन्हें श्रीगणेश का आह्वान करने को कहा। देवताओं की आराधना पर श्रीगणेश ने विकट सूंड व...

जब एक बच्चा पैदा होता है और गर्भनाल काट दी जाती है, तो उस टुकड़े का क्या होता है जो अभी भी माँ से जुड़ा होता है?

जब एक बच्चा पैदा होता है और गर्भनाल काट दी जाती है, तो उस टुकड़े का क्या होता है जो अभी भी माँ से जुड़ा होता है? By  वनिता कासनियां पंजाब बच्चा पैदा होने पर वह भाग गर्भनाल काट दी जाती है तो क्या होता है ? यह भाग जो मां से जुड़ा होता है उसे प्लेसेंटा कहते हैं । यह बच्चे को भोजन देने का काम करता है। हर माह एक निश्चित समय पर इसी के कारण पेट मे दर्द होता है। यह एक निश्चित स्थान होता है जो हर माह एक निश्चित समय पर फ़ूल ता है और चट कता है। जिससे रक्त आता है।और पेट मे दर्द होता है । इसे मेन्सट्रूअल सायकिल , एम सी , पीरियड या माहवारी कहते हँ। यह प्रकृति की ओर से एक दिया गया वरदान है जो स्वयं अपने भोजन का इंतजाम कर देता है। मां जो भी चीज खाती है इसके द्वारा बच्चे को मिलती है। यह इसके द्वारा माँ से सांस भी लेता है। बच्चा पैदा होने के बाद मां को सुरक्षित रखने के लिए इसी यह निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं । एक लोहे के चमचे को पानी में छौंक कर पानी दिया जाता है।इससे आयरन मिलता है। इसके लिये ही तो चरुआ रखते हैं व अजवायन का गर्म पानी पिलाते हैं । या पीपरामूल को भी खौलाकर पानी बनाते हैं। अजवायन की धू...